
चीन के तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की सोच और नीति ‘एस- सिक्योरिटी, सी- कनेक्टिविटी और ओ- ऑपर्च्युनिटी’ पर आधारित है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और चीन के बीच 2020 के सीमा विवाद के बाद द्विपक्षीय संबंध जटिल बने हुए हैं।
इस शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेना पीएम मोदी की सात साल बाद चीन की पहली यात्रा है, जो इस मंच को विशेष राजनीतिक महत्व प्रदान करती है। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में मेजबान राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत के लिए धन्यवाद किया और उज्बेकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर उसे बधाई दी।
भारत के ‘3C’ विजन की राजनीतिक व्याख्या
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पेश किए गए ‘एस-सी-ओ’ (SCO) विजन को भारत की विदेश नीति के तीन प्रमुख स्तंभों के रूप में देखा जा रहा है:
सिक्योरिटी (सुरक्षा): पीएम मोदी ने सुरक्षा को किसी भी देश की प्रगति और विकास का आधार बताया। उन्होंने आतंकवाद और अलगाववाद जैसे खतरों पर जोर देते हुए कहा कि यह न केवल अलग-अलग देशों के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक गंभीर चुनौती है। भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ एक कड़ा रुख अपनाया है, और एससीओ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय समूह में इस मुद्दे को उठाना यह दर्शाता है कि भारत आतंकवाद पर किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड को स्वीकार नहीं करता। यह भारत की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह सीमा पार आतंकवाद को एक वैश्विक खतरे के रूप में पेश करता है।
कनेक्टिविटी (संपर्क): यह भारत के लिए एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्तंभ है। जबकि चीन अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के माध्यम से यूरेशियाई क्षेत्र में कनेक्टिविटी को बढ़ावा दे रहा है, पीएम मोदी ने कनेक्टिविटी का उल्लेख कर भारत की अपनी क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के महत्व को रेखांकित किया। यह भारत का एक तरीका है कि वह चीन के प्रभुत्व के बिना, अपने स्वयं के रणनीतिक और आर्थिक हितों के अनुरूप एशिया और मध्य एशिया में व्यापार और परिवहन के नेटवर्क को बढ़ावा दे सकता है।
ऑपर्च्युनिटी (अवसर): तीसरा स्तंभ आर्थिक सहयोग और व्यापार के अवसरों से जुड़ा है। एससीओ के सदस्य देशों में विशाल बाज़ार और संसाधन हैं। पीएम मोदी का यह बयान यह संकेत देता है कि भारत एससीओ को आर्थिक साझेदारी के लिए एक मंच के रूप में देखता है। यह भारत के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने का एक अवसर है, जो ऊर्जा और अन्य संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

शी जिनपिंग का संबोधन और यात्रा का महत्व
पीएम मोदी के बाद, मेजबान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने एससीओ को दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन बताते हुए इसकी ऐतिहासिक सफलताओं पर जोर दिया। शी जिनपिंग ने सदस्य देशों से संगठन को और मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करने की अपील की। यह दिखाता है कि चीन, एससीओ को अपनी विदेश नीति और क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करने के एक प्रमुख उपकरण के रूप में देखता है।
यह यात्रा दोनों देशों के लिए द्विपक्षीय संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत हो सकती है। 2020 के सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में ठहराव आ गया था। इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी द्वारा एससीओ फोटो सेशन से जुड़ी तस्वीर को सोशल मीडिया पर साझा करना भी दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक राजनयिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। कुल मिलाकर, यह सम्मेलन भारत के लिए अपनी विदेश नीति के प्रमुख तत्वों को मुखरता से रखने और चीन के साथ एक कठिन लेकिन महत्वपूर्ण राजनयिक संबंध बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है।

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