
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की नींव वयस्क मताधिकार पर टिकी है, और इसकी शुचिता बनाए रखने के लिए मतदाता सूचियों का सटीक और अद्यतन होना परम आवश्यक है। हाल ही में, चुनाव आयोग ने 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी ‘एसआइआर अभियान’ को शुरू करने का एलान किया है। इस अभियान का मूल उद्देश्य चुनावी अंतराल को सुनिश्चित करना है ताकि किसी भी गैर-भारतीय नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल न रह सके।
राजनीतिक मामलों के जानकार डॉ. एन.एन. दीक्षित का स्पष्ट मत है कि चुनाव आयोग का यह सुनिश्चित करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है कि केवल वही व्यक्ति मतदान कर सके जो भारत का नागरिक है और उस क्षेत्र का ‘सामान्यतः निवासी’ है। यह प्रक्रिया केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि संविधान के उदात्त उद्देश्यों को पूरा करने का एक पुनीत कर्तव्य है।
विपक्षी विरोध और संवैधानिक मार्गदर्शन
चुनाव आयोग की इस पहल का विपक्षी दलों ने विरोध शुरू कर दिया है। विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल पर आरोप लगा रहे हैं कि इस पुनरीक्षण का उद्देश्य बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं, विशेष रूप से अल्पसंख्यक और वंचित वर्गों के नाम सूची से हटाना है। विपक्षी दलों का कहना है कि:–
1-आधार कार्ड या दस्तावेजों की मांग: पुनरीक्षण के दौरान आधार कार्ड या अन्य दस्तावेजों की मांग से कई लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं, जो मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
2- सीमित समय सीमा: इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के सत्यापन के लिए दी गई कम समय सीमा प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बना सकती है, जिससे वास्तविक मतदाता छूट सकते हैं।
इन आपत्तियों के बावजूद, भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण के महत्व को स्थापित किया है। संविधान के अनुच्छेद-324 में चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने ‘लक्ष्मी चरन सैन बनाम एकेएम हसन’ (1985) मामले में स्पष्ट किया था कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण निरंतर चलते रहने वाली एक प्रक्रिया है, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अनवरत चलती रहनी चाहिए।
वयस्क मताधिकार और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम
वयस्क मताधिकार भारतीय लोकशाही का मूल सिद्धांत है। संविधान के अनुच्छेद-326 में यह उल्लिखित है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। प्रत्येक भारतीय नागरिक, जिसने 18 वर्ष की उम्र पूरी कर ली है और जो विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा अयोग्य नहीं ठहराया गया है, वह वोट देने का पात्र है।
अनुच्छेद-326 में दिए गए अधिकार का प्रयोग करते हुए संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 बनाया। इस कानून में मतदाता सूची को तैयार करने के संबंध में व्यापक उपबंध दिए गए हैं, जो नागरिकता और निवास की शर्तों को स्पष्ट करते हैं:–
1- धारा 16 (1) (ए): जो व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है, उसे मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं किया जा सकेगा।
2- धारा 16(2): यदि किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में पंजीकृत भी हो गया है, तो भी उसका नाम मतदाता सूची से निकाल दिया जाएगा।
3- धारा 20 (सामान्यतः निवासी): चूँकि किसी मतदाता का नाम देश में केवल एक स्थान पर ही पंजीकृत हो सकता है, इसलिए पुनरीक्षण में यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह उस स्थान का ‘सामान्यतः निवासी’ हो जहाँ पर उसका नाम हो। धारा 20 विस्तार से व्याख्या करती है कि केवल घर होने मात्र से कोई व्यक्ति वहाँ का ‘सामान्यतः निवासी’ नहीं मान लिया जाएगा, अपितु उसे यह भी साबित करना पड़ेगा कि वह व्यावहारिक रूप से उस निर्वाचन क्षेत्र में निवास भी करता है।
4- धारा 21: इसके अंतर्गत जमीनी स्तर के अधिकारियों को सुनिश्चित करना होता है कि मतदाता भारत का नागरिक हो तथा वह उस जगह पर सामान्यतः निवास करता हो।
न्यायिक जाँच और कानूनी निवारण
निर्वाचन प्रक्रिया की जीवंतता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि पुनरीक्षण लगातार होता रहे और अवैध/गैर-नागरिक मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता रहे।
न्यायबोध सुनिश्चित करना लोकशाही का प्रमुख कर्तव्य होता है, इसलिए मतदाता पुनरीक्षण के मामलों में विशेष सावधानी बरती जाती है। यदि किसी के साथ अन्याय न हो, इसके लिए धारा-24 में कहा गया है कि यदि कोई मतदाता इस तरह से तैयार की गई मतदाता सूची से असंतुष्ट है तो वह जिला मजिस्ट्रेट या अन्य नियत प्राधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है। इसके बाद भी यदि कोई व्यक्ति असंतुष्ट है तो अनुच्छेद-226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय का विकल्प भी खुला हुआ है।
आधार कार्ड की प्रासंगिकता पर विवाद
मतदाता सूची के पुनरीक्षण के समय आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों की प्रासंगिकता से जुड़े विवाद लगातार आ रहे हैं। इस संदर्भ में, आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित वितरण) अधिनियम-2016 की धारा 9 में उल्लिखित है कि:
केवल आधार नंबर या उसका प्रमाणीकरण ही किसी व्यक्ति के अधिवास या नागरिकता का स्वतः प्रमाण नहीं माना जाएगा।
इसका स्पष्ट अर्थ है कि किसी व्यक्ति को नागरिकता को साबित करने के लिए संविधान और नागरिकता अधिनियम की शर्तों को पूरा करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ‘डॉ. योगेश भारद्वाज बनाम उत्तर प्रदेश’ (1990) मामले की सुनवाई में भी स्पष्ट किया था कि:
वैध रूप से भारत में रहने वाले व्यक्ति ही अधिवासी माने जाएंगे और यदि कोई व्यक्ति आव्रजन कानून का उल्लंघन करते हुए कहीं पर रहता है तो उसे देश का निवासी नहीं माना जा सकता।
संवैधानिक निर्देशों का उल्लंघन और नागरिक का कर्तव्य
यह भारत के चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल न हो सके। इसलिए यदि किसी मतदाता की पात्रता पर कोई संदेह है तो इस संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी है कि उसकी सम्यक जाँच करे। यदि ऐसा नहीं होता तो यह संवैधानिक निर्देशों का उल्लंघन जैसा होगा।
इस प्रक्रिया में मतदाता सूची का पुनरीक्षण केवल औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, अपितु संविधान के उदात्त उद्देश्यों का पूरा करने का पुनीत कर्तव्य भी है। इसमें यदि किसी भी तरह की चूक या त्रुटि संविधान के अनुच्छेद-14 (1) (ए) और अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है।
अतः हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह इसके पुनरीक्षण में सहयोग करे और यदि कोई शिकायत है तो संविधान और कानून में दिए गए उपबंधों के अनुसार आगे बढ़े। लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने के लिए मतदाता सूची का पारदर्शी और सटीक होना सबसे पहली शर्त है, जिसे चुनाव आयोग को हर कीमत पर सुनिश्चित करना होगा।

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