
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी उच्च हैसियत और आरामदायक जीवन को त्यागकर राष्ट्र के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया। इन्हीं में से एक थे देशबंधु चित्तरंजन दास। ढाका के बिक्रमपुर के तेलिरबाग गांव में 5 नवंबर 1870 को जन्मे इस बालक ने न केवल लंदन से बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की, बल्कि अपनी वाक्पटुता और कानूनी ज्ञान से भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दी।

न्याय की आग और बैरिस्टर की वापसी
चित्तरंजन दास के पिता, भुवन मोहन दास, कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे, जबकि मां, नंदिनी देवी, ब्रह्म समाज की आध्यात्मिक अनुयायी थीं। घर में वेद-उपनिषद की चर्चा और रवींद्र संगीत की धुनें गूंजती थीं, जिसने युवा चित्तरंजन को कविता और न्याय दोनों से जोड़ा। 1893 में लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे दास ने कलकत्ता हाईकोर्ट में अपना पहला केस जीतने के बाद मिली 500 रुपए की फीस गरीब मुवक्किल को लौटा दी। उनका मानना था, ‘मेरा मुकदमा न्याय का था, धन का नहीं।’
अलीपुर बम कांड: ‘देशबंधु’ उपनाम की उत्पत्ति
चित्तरंजन दास की कानूनी प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रदर्शन 1908 के अलीपुर बम कांड में देखने को मिला। जब क्रांतिकारी अरविंद घोष पर राजद्रोह का मुकदमा चला, तो किसी बड़े वकील ने उनका केस लड़ने की हिम्मत नहीं जुटाई। चित्तरंजन दास ने यह जिम्मेदारी ली। उन्होंने लगातार 11 दिन तक अदालत में ऐसे तर्क दिए और अंतिम वक्तव्य इतना प्रभावशाली था कि जज को अंततः घोष को बरी करना पड़ा। जब चित्तरंजन दास अदालत से बाहर निकले, तो लोगों ने उत्साह में उन्हें ‘देशबंधु! देशबंधु!’ कहकर पुकारा। यही उपनाम उनके जीवन का स्थायी परिचय बन गया।

वकालत का त्याग और असहयोग आंदोलन
1920 में, जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा, तब चित्तरंजन दास कलकत्ता के सबसे अमीर और सफल वकीलों में से एक थे। उनके पास कोठी, कार और अंग्रेजी सूट जैसी सभी सुख-सुविधाएं थीं। लेकिन राष्ट्रप्रेम की पुकार पर उन्होंने एक निर्णायक फैसला लिया। एक सुबह उन्होंने अपनी पत्नी बसंती देवी से कहा, ‘आज से वकालत बंद।’ उन्होंने कोर्ट का कोट उतारकर खादी का कुर्ता पहना, अपनी कोठी बेच दी और उससे मिला सारा पैसा असहयोग कोष में दान कर दिया। जब उन्हें जेल हुई, तो उन्होंने हंस कर जेलर को जवाब दिया कि ‘मेरा असली मुकदमा अब भारत का है।’
स्वराज पार्टी का गठन और ‘परिषद में घुसो’ नीति
1922 में, चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने जब आंदोलन वापस ले लिया, तो चित्तरंजन दास इस फैसले से असहमत थे। उनका मानना था कि संघर्ष को विधानसभाओं के भीतर ले जाना चाहिए। उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। उनका नारा था – ‘परिषद में घुसो, अंदर से तोड़ो।’
1923 के बंगाल विधानसभा चुनाव में स्वराज पार्टी ने बहुमत हासिल किया और दास विपक्ष के नेता बने। एक बार जब हिंदुओं पर कर लगाने के लिए गैर-कुर्बानी विधेयक लाया गया, तो दास ने विधानसभा में जोरदार विरोध किया और कहा कि यह कर नहीं, हिंदू धर्म पर हमला है। उनके प्रभावशाली नेतृत्व के कारण विधेयक गिर गया। एक अंग्रेजी गवर्नर ने उन्हें देखकर कहा था कि यह ‘बंगाली जादूगर’ है।
मजदूरों के हक की आवाज़
चित्तरंजन दास केवल राजनीतिज्ञ नहीं थे, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। 1920 में उन्होंने अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने जूट मिल मजदूरों की हड़ताल में शामिल होकर कहा था कि, ‘मजदूर का पसीना ही राष्ट्र का खून है।’
1925 में दार्जिलिंग में मात्र 54 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग सड़कों पर थे, और गांधी जी ने उनके जाने को अपनी व्यक्तिगत क्षति बताया था। चित्तरंजन दास का जीवन आज भी त्याग, न्याय और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत उदाहरण है।

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