
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही राज्य का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और कांग्रेस के बीच का पुराना और मजबूत दिखने वाला रिश्ता अब सीट बंटवारे और शासन में भागीदारी की मांगों के चलते दरकता नजर आ रहा है। पिछले दो महीनों से पर्दे के पीछे चल रहा यह तनाव अब सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर तीखी बयानबाजी के रूप में सामने आ गया है, जिससे विपक्षी ‘इंडी ब्लॉक’ की एकता पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
राहुल गांधी की नाराजगी और बिहार वाला डर
गठबंधन के भीतर चल रही इस खींचतान में कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने हस्तक्षेप किया है। सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने DMK की उप महासचिव कनिमोझी के सामने दिल्ली की बैठक में अपनी स्पष्ट नाराजगी जाहिर की। राहुल का मुख्य विरोध गठबंधन वार्ता की शुरुआत में हो रही अनावश्यक देरी को लेकर है। उन्होंने चेतावनी दी है कि तमिलनाडु में बिहार विधानसभा चुनाव जैसी स्थिति पैदा न हो, जहाँ देरी और कम सीटों के कारण कांग्रेस का प्रदर्शन प्रभावित हुआ था। राहुल गांधी चाहते हैं कि फरवरी के अंत तक सीटों का खाका स्पष्ट हो जाए ताकि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय हो सकें।

सत्ता में हिस्सेदारी’ की मांग और ऐतिहासिक टीस
तमिलनाडु कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि पार्टी 1967 के बाद से राज्य की सत्ता से बाहर है। सांसद मणिकम टैगोर, ज्योतिमणि और केएस अलागिरी जैसे नेताओं का कहना है कि कांग्रेस ने हर बार DMK की जीत में अहम भूमिका निभाई है, इसलिए अब उन्हें सरकार में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। वे 2021 के आंकड़ों का हवाला दे रहे हैं, जहाँ कांग्रेस ने 25 में से 18 सीटें जीतकर शानदार स्ट्राइक रेट दर्ज किया था। अब कांग्रेस युवा चेहरों के लिए अधिक अवसर और लगभग 45 सीटों की मांग पर अड़ी है।
मुख्यमंत्री स्टालिन का कड़ा रुख और ‘राजनीतिक संस्कृति
कांग्रेस की ‘गठबंधन सरकार’ मॉडल की मांग को मुख्यमंत्री और DMK अध्यक्ष एमके स्टालिन ने लगभग सिरे से खारिज कर दिया है। 11 फरवरी को अपने एक बयान में स्टालिन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सत्ता साझा करना तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है।” DMK मंत्रियों रघुपाथी और राजकन्नप्पन के कड़े बयानों ने इस विवाद की आग में घी डालने का काम किया है। DMK का मानना है कि राज्य में उनकी अपनी ताकत इतनी है कि उन्हें किसी को कैबिनेट में जगह देने की मजबूरी नहीं है।
विजय की TVK पार्टी का बढ़ता डर
कांग्रेस के भीतर एक खेमा यह भी चेतावनी दे रहा है कि यदि DMK ने उन्हें सम्मानजनक सीटें और सत्ता में भूमिका नहीं दी, तो जमीनी स्तर का कार्यकर्ता और युवा नेतृत्व अभिनेता विजय की नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) की ओर रुख कर सकता है। विजय की पार्टी युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है, और कांग्रेस की अनदेखी से उत्पन्न असंतोष का लाभ उसे मिल सकता है। यह स्थिति DMK और कांग्रेस गठबंधन के लिए भविष्य में आत्मघाती साबित हो सकती है।
DMK की दबाव वाली रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि DMK जानबूझकर गठबंधन वार्ता में देरी कर रही है। उसकी रणनीति पहले छोटे सहयोगी दलों (जैसे वामपंथी दल, VCK) को सीटें आवंटित करने की है, ताकि अंतिम चरण में कांग्रेस के पास समझौता करने के अलावा कोई विकल्प न बचे। 22 फरवरी से औपचारिक बातचीत शुरू होनी है, लेकिन जिस तरह से दोनों पक्षों के नेता सोशल मीडिया पर आपस में भिड़ रहे हैं, उसे देखते हुए यह बातचीत काफी पेचीदा होने वाली है।
तमिलनाडु का यह चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में कांग्रेस के अस्तित्व और DMK के प्रभुत्व की परीक्षा भी है। क्या एमके स्टालिन झुककर कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी देंगे, या कांग्रेस एक बार फिर छोटे भाई की भूमिका में सिमट कर रह जाएगी? आने वाले हफ्तों में होने वाली बैठकें न केवल तमिलनाडु, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर इंडी गठबंधन के भविष्य की दिशा तय करेंगी।

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