
भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे बहुत कम नेता हुए हैं जिन्होंने अपनी सादगी और शुचिता से सत्ता की परिभाषा ही बदल दी। बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर एक ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे। 24 जनवरी 1924 को जन्में कर्पूरी ठाकुर ने आजीवन समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की लड़ाई लड़ी। उनकी सादगी का आलम यह था कि मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए भी वे रिक्शे से चलना पसंद करते थे और उनके कुर्ते की जेब अक्सर फटी रहती थी।
विरासत में नहीं छोड़ा एक भी मकान
आज के दौर में जहाँ छोटे से छोटे जन प्रतिनिधि के पास अकूत संपत्ति होती है, वहीं कर्पूरी ठाकुर ने ईमानदारी का ऐसा मानक स्थापित किया जिसे छू पाना असंभव लगता है। पटना जैसे बड़े शहर को तो छोड़िए, अपने अंतिम सफर पर जाने से पहले तक उनके पैतृक गांव में उनका एक पक्का मकान तक नहीं था। वे चाहते तो मुख्यमंत्री रहते हुए अपने परिवार के लिए संपत्तियों का अंबार लगा सकते थे, लेकिन उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
जब दोस्त से मांगकर पहनना पड़ा फटा हुआ कोट
कर्पूरी ठाकुर की सादगी का एक अंतरराष्ट्रीय किस्सा बेहद मशहूर है। एक बार उन्हें एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में ऑस्ट्रेलिया जाने का अवसर मिला। उस समय वे बिहार के बड़े नेता थे, लेकिन उनके पास विदेश जाने लायक एक ढंग का कोट तक नहीं था। उन्होंने अपने एक मित्र से कोट उधार लिया, लेकिन वह कोट भी जगह-जगह से फटा हुआ था।

कर्पूरी ठाकुर बिना किसी हिचक के वही फटा कोट पहनकर ऑस्ट्रेलिया चले गए। वहाँ युगोस्लाविया के मार्शल टिटो की नजर जब उनके फटे कोट पर पड़ी, तो वे दंग रह गए कि भारत का इतना बड़ा नेता इस हाल में है। मार्शल टिटो ने प्रभावित होकर उन्हें एक नया कोट उपहार में दिया था।
फटे कुर्ते की जेब और चंद्रशेखर का चंदा
कर्पूरी ठाकुर के जीवन का एक और भावुक कर देने वाला प्रसंग पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से जुड़ा है। एक बार मुख्यमंत्री आवास पर बैठक चल रही थी, जहाँ चंद्रशेखर भी मौजूद थे। उन्होंने देखा कि मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के कुर्ते की जेब फटी हुई है। चंद्रशेखर से यह देखा नहीं गया। उन्होंने अपने कुर्ते को झोली की तरह फैलाया और बैठक में मौजूद लोगों से चंदा मांगना शुरू कर दिया।
चंदा इकट्ठा कर जब उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को दिया और कहा कि “इन पैसों से अपना कुर्ता सिलवा लीजिएगा”, तो सादगी के उस प्रतिमूर्ति ने पैसे तो रख लिए, लेकिन अगले ही पल उन्हें ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ में जमा करा दिया। उनके लिए अपनी सुविधा से बड़ा जनता का हित था।
लोहिया और जेपी के सिद्धांतों के सच्चे राही
कर्पूरी ठाकुर स्कूल के दिनों से ही समाजवादी विचारधारा से जुड़ गए थे। वे डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण (जेपी) को अपना आदर्श और गुरु मानते थे। लोहिया जी अक्सर ‘कथनी और करनी में एकता’ की बात करते थे, और कर्पूरी ठाकुर ने इसे अक्षरशः अपने जीवन में उतारा। पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उनके बारे में लिखा था कि वे राजनीति के सहारे नहीं चलते थे, बल्कि राजनीति उनके सहारे चलती थी। जेपी और लोहिया जैसे दिग्गजों के सानिध्य में रहकर उन्होंने गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का संकल्प लिया था।

भीड़ की आत्मा थे जननायक
कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व को किसी कवि ने इन पंक्तियों में पिरोया था— “वो आदमी, जो भीड़ से घिरा बहुतों की नजर में सिरफिरा है, दरअसल परमात्मा नहीं, भीड़ की आत्मा है।” वास्तव में वे जनता के बीच के ही व्यक्ति थे। 14 साल की कोमल आयु में उन्होंने युवाओं को संगठित कर ‘नवयुवक संघ’ बनाया और एक लाइब्रेरी की स्थापना की। उनमें नेतृत्व के गुण जन्मजात थे।
चुनाव के लिए मां से मांगते थे पहला चंदा
आज के चुनावों में जहाँ करोड़ों-अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, वहीं कर्पूरी ठाकुर लोकतंत्र को अपना धर्म मानते थे। वे जब भी चुनाव मैदान में उतरते थे, तो सबसे पहले अपनी मां के पास जाकर पहला चंदा मांगते थे। कभी एक आना तो कभी आठ आना—यही उनकी चुनावी शुरुआत होती थी। उन्होंने समाज को सिखाया कि राजनीति धन बल से नहीं, जन बल और सिद्धांतों से जीती जाती है।
अंतिम सफर और अमिट पहचान
17 फरवरी 1988 को इस महान जननायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने के बाद भी बिहार और देश की राजनीति में उनकी ईमानदारी की मिसालें दी जाती हैं। हाल ही में भारत सरकार द्वारा उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाना उनके त्याग और तपस्या को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। कर्पूरी ठाकुर केवल एक नेता नहीं थे, वे उस शुचिता के प्रतीक थे जो अब भारतीय राजनीति में दुर्लभ होती जा रही है। कबीर की पंक्तियों की तरह उन्होंने अपनी जीवन रूपी ‘चदरिया’ को अत्यंत जतन से ओढ़ा और उसे बेदाग ही वापस सौंप दिया।

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