
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो बाहर से साधारण दिखती हैं, लेकिन उनके गर्भ में युगांतरकारी परिवर्तन छिपे होते हैं। 1950 में संविधान लागू होने के बाद भी समाज का एक बड़ा हिस्सा मानसिक गुलामी और भेदभाव की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के कुछ समय बाद, पुणे की एक प्रयोगशाला में घटी एक छोटी सी घटना ने आने वाले समय में भारत की सत्ता के समीकरणों को बदलने वाले महानायक ‘मान्यवर कांशीराम’ को जन्म दिया।
पुणे की वो प्रयोगशाला और दीना भामा की जिद
बात 1950 के दशक के अंतिम वर्षों की है। पुणे स्थित ‘विस्फोटक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला’ (ERDL) में दीना भामा नामक एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यरत थे। दीना भामा बाबा साहब आंबेडकर के विचारों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। बाबा साहब की जयंती आने वाली थी और दीना चाहते थे कि उन्हें इस पावन अवसर पर अपने आराध्य को नमन करने के लिए छुट्टी मिले। वे आवेदन लेकर अपने उच्चाधिकारी के पास पहुंचे, लेकिन तत्कालीन सामाजिक परिवेश और प्रशासनिक हठधर्मिता के कारण साहब ने छुट्टी देने से साफ इनकार कर दिया।
दीना भामा अपनी जिद पर अड़े रहे। उनके लिए यह केवल एक छुट्टी नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और पहचान का विषय था। विवाद इतना बढ़ा कि प्रबंधन ने दीना भामा पर अनुशासनहीनता का ठप्पा लगा दिया और उन्हें सरकारी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

युवा अफसर कांशीराम और पहली मुलाकात
दीना भामा की बर्खास्तगी की खबर दफ्तर में आग की तरह फैली। उसी समय पंजाब से आए एक 24 वर्षीय युवा प्रथम श्रेणी अधिकारी वहां तैनात थे—नाम था कांशीराम। पंजाब के रोपड़ में जन्मे कांशीराम उच्च शिक्षित थे और एक सुरक्षित करियर की ओर बढ़ रहे थे। जब उन्हें पता चला कि एक सफाईकर्मी को सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि वह आंबेडकर जयंती की छुट्टी मांग रहा था, तो वे दीना भामा के पास पहुंचे।
कांशीराम ने देखा कि दीना भामा की आंखों में आंसू थे। दीना ने सिसकते हुए बताया कि वे बहुजन समाज से हैं, इसलिए उनके साथ यह निष्ठुरता बरती गई है। कांशीराम स्वयं भी उसी समाज से आते थे, लेकिन पंजाब के वातावरण में उन्हें कभी ऐसे सीधे भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा था। दीना भामा की पीड़ा ने उन्हें पहली बार समाज की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया।
जब कांशीराम ने जाना ‘बाबा साहब’ का विराट रूप
दिलचस्प बात यह है कि उस समय तक कांशीराम बाबा साहब आंबेडकर के योगदान से पूरी तरह परिचित नहीं थे। दीना भामा ने ही उन्हें बताया कि कैसे उन्होंने जयपुर से दिल्ली जाकर बाबा साहब का भाषण सुना था और क्यों वे उनके आजीवन आभारी रहेंगे। कांशीराम दीना की बातों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं संकल्प लिया— “चिंता मत करो, मैं तुम्हारे लिए लड़ूंगा। आज से तुम अकेले नहीं हो।”
संघर्ष का आगाज और पहली वैचारिक जीत
कांशीराम ने दीना भामा की बहाली के लिए विभाग के प्रबंधन से सीधा मोर्चा खोल दिया। उन्होंने न केवल सेवा नियमावली का सहारा लिया, बल्कि बाबा साहब की प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का उच्छेद) का भी अध्ययन किया। इस अध्ययन ने उनके भीतर की वैचारिक चेतना को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने तन-मन-धन से दीना भामा का साथ दिया और अंततः प्रबंधन को झुकना पड़ा। दीना भामा की नौकरी बहाल हुई, लेकिन इस जीत ने कांशीराम को एक बड़े उद्देश्य की ओर मोड़ दिया।

नौकरी का त्याग और बहुजन आंदोलन का जन्म
दीना भामा की बहाली के बाद कांशीराम को अहसास हुआ कि व्यक्तिगत जीत से पूरे समाज का भला नहीं होगा। उन्होंने नौकरी में रहते हुए ही ‘बामसेफ’ और बाद में ‘डीएस-4’ जैसे संगठनों की नींव रखी। उन्हें लगा कि आला दर्जे की नौकरी उनके समाज के लिए लड़ने की राह में बाधा है। महज दस साल की सेवा के भीतर ही उन्होंने अपनी चमकदार सरकारी नौकरी को लात मार दी और सन्यासी की तरह अपना जीवन बहुजन आंदोलन को समर्पित कर दिया।
उत्तर प्रदेश और राजनीति का शिखर
कांशीराम ने बाबा साहब के अधूरे मिशन को आगे बढ़ाया और उत्तर प्रदेश को अपनी मुख्य कर्मभूमि बनाया। उन्होंने “पे बैक टू सोसाइटी” का मंत्र दिया और शिक्षित वर्ग को समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई। उनके नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक बड़ी ताकत बनकर उभरी, जिसने सदियों से दबे-कुचले लोगों को सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया।
आज 15 मार्च को जन्मे मान्यवर कांशीराम (1934-2006) के योगदान को याद करते हुए समाज उनकी उस सीख को दोहराता है— “हम तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक हम व्यवस्था के पीड़ितों को एकजुट नहीं कर लेते हैं।” दीना भामा की वो एक छुट्टी वास्तव में भारत के करोड़ों वंचितों के लिए सम्मान और सत्ता के मार्ग की शुरुआत थी।

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