
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति में गठबंधन के समीकरणों को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) के नेतृत्व वाले गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर मामला अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। विशेष रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने आगामी चुनाव के लिए अपनी सीटों की संख्या को लेकर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे गठबंधन के भीतर बेचैनी बढ़ गई है।
6 सीटों की मांग पर कायम सीपीआई
सोमवार को पार्टी मुख्यालय में आयोजित राज्य कार्यकारी समिति की बैठक के बाद सीपीआई ने स्पष्ट संदेश दिया कि वह किसी भी परिस्थिति में समझौते के मूड में नहीं है। पार्टी नेतृत्व ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि वे 2021 के विधानसभा चुनाव में मिली 6 सीटों की संख्या से कम पर राजी नहीं होंगे। पार्टी नेताओं का तर्क है कि पिछले पांच वर्षों में जमीनी स्तर पर उनका संगठन और अधिक मजबूत हुआ है, इसलिए उनकी मांग पूरी तरह उचित और तर्कसंगत है।
बैठक में गठबंधन की रणनीतियों पर मंथन
राज्य कार्यकारी समिति की इस महत्वपूर्ण बैठक में डीएमके नेतृत्व के साथ अब तक हुई चर्चाओं की विस्तृत समीक्षा की गई। पार्टी नेताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि सीट बंटवारे में हो रही देरी और सीटों की संख्या कम करने का कोई भी प्रयास गठबंधन के आंतरिक सामंजस्य को नुकसान पहुंचा सकता है। सीपीआई का मानना है कि सीटों की संख्या बरकरार रखना न केवल उनकी संगठनात्मक शक्ति के लिए जरूरी है, बल्कि यह गठबंधन के भीतर वामपंथी प्रभाव के संतुलन को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है।

वामपंथी दलों की एकजुटता और समानांतर बातचीत
डीएमके के साथ चल रहे इस गतिरोध के बीच वामपंथी दल एक ‘संयुक्त मोर्चा’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में सीपीआई के राज्य सचिव एम. वीरपांडियन और सीपीआई (एम) के राज्य सचिव पी. शनमुगम के बीच समानांतर बातचीत का दौर जारी है। दोनों वामपंथी दल चाहते हैं कि डीएमके के सामने वे एकजुट होकर अपना पक्ष रखें ताकि गठबंधन में उनके प्रतिनिधित्व को कम न किया जा सके। उनकी यह एकजुटता डीएमके नेतृत्व पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है।
नए सहयोगियों के आगमन से बढ़ी मुश्किलें
सीटों के बंटवारे में इस बार जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आ रही है, वह है डीएमके की नए सहयोगियों को गठबंधन में शामिल करने की इच्छा। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन अपनी ताकत बढ़ाने के लिए कुछ नए छोटे दलों को गठबंधन का हिस्सा बनाना चाहते हैं। हालांकि, मौजूदा सहयोगी दल इस कदम को लेकर खासे सतर्क हैं। उन्हें डर है कि नए साथियों को सीटें देने के चक्कर में उनके कोटे में कटौती की जा सकती है। सीपीआई ने स्पष्ट कर दिया है कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच असंतोष पैदा करने वाला कोई भी फैसला गठबंधन के चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
डीएमके के सामने साख बचाने की चुनौती
जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन के लिए अपने पुराने साथियों को संतुष्ट रखना एक बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है। गठबंधन की एकता ही चुनाव में उनकी जीत की सबसे बड़ी चाबी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या डीएमके सीपीआई की 6 सीटों की मांग को स्वीकार करती है या फिर सीट बंटवारे का यह विवाद किसी नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देता है। फिलहाल, वामपंथियों के कड़े रुख ने चुनावी बिसात पर हलचल तेज कर दी है।

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