
इस वर्ष का मानसून देश के लिए चेतावनी बनकर आया। विदाई के समय भी इसकी तीव्रता ने यह स्पष्ट कर दिया कि वर्षा का पारंपरिक स्वरूप अब बदल चुका है। जहां पहले बाढ़ का प्रकोप मुख्यतः पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहता था, वहीं इस बार इसका विस्तार देश के लगभग हर कोने तक पहुंच गया। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य भी अतिवृष्टि की चपेट में आ गए।
खेतों से लेकर शहरों तक तबाही
पंजाब और हरियाणा जैसे खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसलें बर्बाद हो गईं। पहाड़ी राज्यों में बादल फटने की घटनाओं ने जन-धन की भारी हानि पहुंचाई। यह केवल एक दुर्योग नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। तूफान, चक्रवात, अतिवृष्टि, भूस्खलन और बादल फटने जैसी आपदाएं अब अधिक बार और अधिक तीव्रता से होंगी। इससे न केवल कृषि बल्कि देश के आधारभूत ढांचे—रेल, सड़क, बिजली, दूरसंचार, पुल आदि—को भी गंभीर क्षति पहुंचेगी।
वैज्ञानिक चेतावनी और पूर्वानुमान की सीमाएं
विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार आने वाले वर्षों में बादल फटने की घटनाएं और अधिक होंगी, लेकिन इनकी सटीक भविष्यवाणी करना अब भी असंभव है। मौसम विज्ञान के आधुनिकतम उपकरण भी इस चुनौती से पार नहीं पा सके हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि देश जल से संबंधित अवसंरचना को बार-बार मरम्मत के बजाय एक बार सुदृढ़ रूप से तैयार करे।

विकास की दौड़ में पीछे रह गया जल अवसंरचना
भारत ने सड़क, रेल, हवाई मार्ग, बिजली और मोबाइल नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन क्षेत्रों में निवेश से राजस्व भी प्राप्त होता है, जिससे उनका रख-रखाव संभव हो पाता है। लेकिन जल अवसंरचना के मामले में स्थिति अलग है। यहां से प्रत्यक्ष राजस्व नहीं आता, जिससे निजी कंपनियां निवेश करने से कतराती हैं। यही कारण है कि जल संसाधनों के प्रबंधन में अब भी कई कमियां बनी हुई हैं।
जल शक्ति मंत्रालय और नदियों को जोड़ने की योजनाएं
जल शक्ति मंत्रालय की स्थापना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी प्रासंगिकता तभी सिद्ध होगी जब ‘हर घर को नल से जल’ और ‘हर खेत को जल’ जैसे अभियानों को पाइपलाइन और नहरों के व्यापक नेटवर्क से जोड़ा जाए। नदियों को जोड़ने की योजना 1972 से विचाराधीन है, लेकिन अब तक कुछ ही उदाहरण सामने आए हैं। यदि इन योजनाओं को जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण से जोड़ा जाए, तो एक स्थान का अतिरिक्त जल दूसरे स्थान के लिए संसाधन बन सकता है।

रख-रखाव की चुनौती और निवेश की आवश्यकता
जल अवसंरचना के निर्माण के बाद उसका रख-रखाव भी एक बड़ी चुनौती है। सीमित राजस्व के कारण आवश्यक संसाधन नहीं जुट पाते, जिससे ढांचा कमजोर होता है। वर्ष 2019-2020 की परिकल्पना के अनुसार भारत को अगले 15 वर्षों में जल अवसंरचना पर 270 अरब डॉलर का निवेश करना था। अब समय आ गया है कि इस परिकल्पना को पुनः सक्रिय किया जाए और निवेश की गति बढ़ाई जाए।
जल सुरक्षा से ही आत्मनिर्भर भारत संभव
वर्तमान सरकार का लक्ष्य आत्मनिर्भर और विकसित भारत है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब देश जल के क्षेत्र में सुरक्षित हो। कृषि, उद्योग, शहरी विकास—सभी जल पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम भविष्य में और विकराल होंगे। अतिवृष्टि जनित संकट का स्वरूप क्या होगा, यह केवल प्रकृति जानती है, लेकिन हम तैयारी कर सकते हैं।

समाधान की दिशा में ठोस कदम जरूरी
अब आवश्यकता है कि जल निकासी के लिए एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जाए जो पूरे देश में जल संतुलन स्थापित कर सके। पाइपलाइन और नहरों के माध्यम से जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाए। चीन की तरह भारी निवेश करके भारत को जल अवसंरचना में सुदृढ़ता लानी होगी। तभी 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना साकार हो सकेगा।
इस मानसून ने हमें चेताया है—अब समय है कि हम चेत जाएं, नहीं तो भविष्य में और भी तबाही के लिए तैयार रहें।

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