
केरल में विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) एक नए आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी छोड़कर जाने वाले अपने पुराने और दिग्गज नेताओं के खिलाफ “क्लास गद्दार” (Class Traitor) शब्द का इस्तेमाल अब पार्टी के लिए ही गले की हड्डी बनता जा रहा है। आलोचकों और राजनीतिक विशेषज्ञों ने पार्टी के इस चयनात्मक रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिससे चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा गया है।
पांच दशक की वफादारी और ‘गद्दार’ का ठप्पा
विवाद की शुरुआत तब हुई जब वी. कुंजीकृष्णन और टी.के. गोविंदन जैसे कद्दावर नेताओं ने पांच दशक से अधिक समय तक पार्टी की सेवा करने के बाद सीपीआई(एम) का साथ छोड़ दिया। इन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर अन्याय और कार्यकर्ताओं की अनदेखी का गंभीर आरोप लगाया था। हालांकि, पार्टी ने उनकी शिकायतों को सुनने के बजाय उन्हें “क्लास गद्दार” के रूप में ब्रांड कर दिया। कल तक जिन नेताओं के सम्मान में नारे लगते थे, आज पार्टी कार्यकर्ता उन्हीं के खिलाफ सड़कों पर उतरकर उन्हें वैचारिक गद्दार बता रहे हैं।
दिग्गजों का पलायन और चुनावी समीकरण
पार्टी को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब दो बार के मंत्री रहे जी. सुधाकरन ने अंबालाप्पुझा से स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस ने भी रणनीतिक रूप से उन्हें और अन्य बागी नेताओं को समर्थन देने की तैयारी कर ली है। इसके अलावा, तीन बार के विधायक एस. राजेंद्रन और आयशा पोट्टी जैसे चेहरों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस का दामन थाम लिया है। इन दिग्गजों के जाने से सीपीआई(एम) के कैडर आधारित गढ़ में सेंध लगती दिख रही है।

पार्टी के दोहरे मापदंड पर उठते सवाल
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सीपीआई(एम) का रुख आत्मघाती और विरोधाभासी है। एक तरफ जहां पार्टी अपने पुराने साथियों को ‘गद्दार’ कह रही है, वहीं दूसरी ओर विरोधी खेमे से आने वाले नेताओं का रेड कारपेट बिछाकर स्वागत किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, कांग्रेस के पूर्व नेता के.पी. अनिल कुमार और डॉ. सरीन को पार्टी में शामिल करते ही न केवल बड़ा ओहदा दिया गया, बल्कि डॉ. सरीन को तो 2024 में दल बदलने के तुरंत बाद उम्मीदवार तक बना दिया गया।
विचारधारा बनाम चुनावी अवसरवाद
ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के वरिष्ठ नेता अब्दुर्रहमान रंदाथानी को मलप्पुरम से उम्मीदवार बनाने पर भी सीपीआई(एम) विचार कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी की यह “पिक एंड चूज” पॉलिसी दर्शाती है कि विचारधारा की एकरूपता केवल अपने सदस्यों को अनुशासित रखने के लिए है, जबकि बाहरी नेताओं के लिए पार्टी के दरवाजे और सिद्धांत हमेशा लचीले रहते हैं।
क्या जनता स्वीकार करेगी यह नैरेटिव?
जैसे-जैसे केरल एक निर्णायक चुनावी मुकाबले की ओर बढ़ रहा है, सीपीआई(एम) के भीतर जारी यह घमासान पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा सकता है। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज है कि क्या ‘क्लास गद्दार’ शब्द का इस्तेमाल केवल उन लोगों को चुप कराने के लिए किया जा रहा है जो नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मतदाता पार्टी के इस ‘प्रगतिशील’ दांव को स्वीकार करते हैं या पुराने वफादारों के साथ हुए व्यवहार का बदला ईवीएम के जरिए लेते हैं।

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