
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हावड़ा लोकसभा सीट का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। हुगली नदी के पश्चिमी तट पर स्थित इस शहर को ‘कोलकाता का जुड़वां शहर’ (Twin City) कहा जाता है। यह जिला न केवल बंगाल का प्रमुख ट्रांसपोर्ट हब है, बल्कि औद्योगिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका महत्व अतुलनीय है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, हावड़ा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए एक अभेद्य दुर्ग साबित हुआ है।
7 विधानसभा क्षेत्रों का सियासी समीकरण
हावड़ा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत कुल 7 विधानसभा सीटें आती हैं: बल्ली, हावड़ा उत्तर, हावड़ा मध्य, शिबपुर, हावड़ा दक्षिण, सांकराइल और पांचला। ये सभी क्षेत्र शहरी और औद्योगिक आबादी से घिरे हुए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां की साक्षरता दर 83.31 प्रतिशत है, जो राज्य के औसत से कहीं अधिक है। घनी आबादी वाले इस क्षेत्र में मतदाताओं का मिजाज सीधे तौर पर राज्य की सत्ता की दिशा तय करता है।
500 साल पुराना गौरवशाली इतिहास
हावड़ा का इतिहास सदियों पुराना है। 1578 में वेनिस के यात्री सेसारे फेडेरिसी ने अपनी डायरी में यहां के ‘बुट्टोर’ (वर्तमान बटोर) बंदरगाह का उल्लेख किया था। 1713 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाह फर्रुखसियर से यहां के पांच गांवों—सालिका, हरिरा, कसुंडेह, रामकृष्णपुर और बत्तर को बसाने की अनुमति मांगी थी, जो आज आधुनिक हावड़ा के हृदय स्थल हैं। 1495 की बंगाली कविता ‘मनसमंगल’ में भी इसके ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।
हावड़ा: बंगाल का प्रवेश द्वार
हावड़ा स्टेशन भारत के सबसे पुराने और व्यस्ततम रेलवे स्टेशनों में से एक है। यह पूरे पश्चिम बंगाल के लिए प्रवेश द्वार का काम करता है। कोलकाता मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (CMDA) का हिस्सा होने के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक शहरीकृत है। यहां की जूट मिलें, इंजीनियरिंग उद्योग और बंदरगाह की सुविधाएं इसे ‘भारत का शेफील्ड’ बनाने की क्षमता रखती हैं, हालांकि प्रदूषण और ट्रैफिक यहां की बड़ी चुनौतियां हैं।

चुनावी आंकड़े: टीएमसी की ‘हैट्रिक’
राजनीतिक रूप से हावड़ा अब पूरी तरह टीएमसी के रंग में रंगा नजर आता है।
2024 चुनाव: टीएमसी के प्रसून बनर्जी ने 6,26,493 वोट पाकर बड़ी जीत दर्ज की, जबकि भाजपा के डॉ. रथिन चक्रवर्ती दूसरे स्थान पर रहे।
2019 चुनाव: इस चुनाव में भी प्रसून बनर्जी ने भाजपा के रंतिदेव सेनगुप्ता को हराकर अपनी पकड़ साबित की थी।
2014 चुनाव: उस समय भी टीएमसी ने करीब 43.4 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा और भाजपा को कोसों पीछे छोड़ दिया था।
भले ही राजनीतिक रूप से यहां टीएमसी मजबूत हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी, पुरानी जूट मिलों की स्थिति और बुनियादी ढांचे का अभाव बड़े मुद्दे हैं। भाजपा यहां ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है, वहीं सीपीएम अपने पुराने आधार को वापस पाने के लिए संघर्षरत है। हावड़ा की जनता के लिए विरासत का गौरव और भविष्य का विकास—दोनों ही चुनावी चर्चा के केंद्र में रहते हैं।

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