
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मौलाना अबुल कलाम आजाद एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता, वाक्पटुता और अटूट राष्ट्रभक्ति से देश को एक नई दिशा दी। आज उनकी पुण्यतिथि (22 फरवरी) के अवसर पर पूरा देश उस महानायक को याद कर रहा है, जिसने न केवल ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं, बल्कि आजादी के बाद एक शिक्षित और समृद्ध भारत की आधारशिला भी रखी।
मक्का में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा का अद्भुत सफर
अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन अहमद, जिन्हें दुनिया ‘आजाद’ के नाम से जानती है, का जन्म 11 नवंबर 1888 को पवित्र शहर मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनके पिता मौलाना मोहम्मद खैरुद्दीन एक प्रसिद्ध विद्वान थे। 1890 के आसपास उनका परिवार कलकत्ता (अब कोलकाता) लौट आया। मौलाना आजाद की शिक्षा किसी औपचारिक स्कूल या विश्वविद्यालय में नहीं हुई। उन्होंने घर पर ही अपने पिता और प्रतिष्ठित विद्वानों के मार्गदर्शन में अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, गणित और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया। उनकी अद्भुत संवाद क्षमता के कारण ही उन्हें ‘अबुल कलाम’ (संवादों का स्वामी) की उपाधि दी गई।

पत्रकारिता के जरिए आजादी का शंखनाद
युवावस्था में ही आजाद के मन में गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की तड़प पैदा हो गई थी। 1912 में उन्होंने उर्दू साप्ताहिक पत्रिका ‘अल-हिलाल’ की शुरुआत की। इस पत्रिका का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना और भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना था। ब्रिटिश सरकार उनकी लेखनी से इतनी भयभीत हुई कि 1914 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद उन्होंने ‘अल-बलाग’ शुरू किया, लेकिन दमनकारी नीतियों के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। कारावास की सलाखें भी उनकी राष्ट्रवादी सोच को नहीं डिगा सकीं।
कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष और गांधीजी का साथ
मौलाना आजाद खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता रहे और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के पुरजोर समर्थक बने। उनकी संगठनात्मक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1923 में मात्र 35 वर्ष की आयु में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद 1940 से 1946 के चुनौतीपूर्ण दौर में भी उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। गांधीजी उनके ज्ञान के इतने कायल थे कि वे उन्हें प्यार से ‘ज्ञान सम्राट’ कहकर संबोधित करते थे।

विभाजन के कट्टर विरोधी और एकता के पैरोकार
मौलाना आजाद उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने देश के बंटवारे का अंतिम समय तक विरोध किया। वे ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ और मुहम्मद अली जिन्ना की विभाजनकारी राजनीति के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत हिंदुओं और मुसलमानों का साझा घर है और बंटवारा देश की आत्मा को कमजोर कर देगा। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ (भारत विभाजन की कहानी) आज भी उस दौर के राजनीतिक घटनाक्रमों का सबसे निष्पक्ष दस्तावेज मानी जाती है।
आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था के वास्तुकार
1947 में जब भारत आजाद हुआ, तो मौलाना आजाद देश के पहले शिक्षा मंत्री बने। उनके कार्यकाल (1947-1958) को भारतीय शिक्षा का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। उन्होंने एक ऐसे भारत का सपना देखा जहाँ शिक्षा हर नागरिक के लिए सुलभ हो।
आईआईटी (IIT): उन्होंने भारत में उच्च तकनीकी शिक्षा की नींव रखने के लिए पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना की।
यूजीसी (UGC): विश्वविद्यालयों के मानकीकरण के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की शुरुआत की।
सांस्कृतिक संस्थान: साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी जैसे संस्थानों की स्थापना उनके ही दूरदर्शी प्रयासों का परिणाम थी।

भारत रत्न और राष्ट्रीय विरासत
22 फरवरी 1958 को दिल्ली में इस महान शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया। देश के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए 1992 में उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। उनकी जयंती, 11 नवंबर, को भारत सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ के रूप में घोषित किया गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके ज्ञान के प्रकाश से जोड़ता है।
मौलाना अबुल कलाम आजाद का जीवन संदेश स्पष्ट है—एकता और शिक्षा ही किसी राष्ट्र की प्रगति के दो सबसे मजबूत स्तंभ हैं। वे केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि एक ऐसी संस्था थे जिन्होंने खंडित होते समाज को जोड़ने और अज्ञानता के अंधेरे को मिटाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

गांव से लेकर देश की राजनीतिक खबरों को हम अलग तरीके से पेश करते हैं। इसमें छोटी बड़ी जानकारी के साथ साथ नेतागिरि के कई स्तर कवर करने की कोशिश की जा रही है। प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक की राजनीतिक खबरें पेश करने की एक अलग तरह की कोशिश है।



