
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित एक प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ के मूल चरित्र, उसकी विकास यात्रा और भविष्य के लक्ष्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ की तुलना किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती, क्योंकि संघ जैसा दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण मौजूद ही नहीं है।
संघ: पैरा मिलिट्री नहीं, व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला
डॉ. भागवत ने उन धारणाओं को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें संघ के अनुशासन और गणवेश को देखकर इसे एक अर्धसैनिक (पैरा मिलिट्री) संगठन माना जाता है। उन्होंने कहा, “संघ की शाखा केवल शारीरिक व्यायाम का केंद्र नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति निर्माण की एक पवित्र कार्यशाला है। यहाँ व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास की प्रक्रिया को मूर्त रूप दिया जाता है, ताकि वह राष्ट्र के लिए समर्पित नागरिक बन सके।”
डॉ. हेडगेवार का चिंतन और ‘स्व’ की पहचान
संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए सरसंघचालक ने बताया कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का संपर्क तिलक, सावरकर, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह जैसे महापुरुषों से था। उन सभी महापुरुषों के मन में एक ही यक्ष प्रश्न था—”हम बार-बार पराधीन क्यों हुए?” डॉ. हेडगेवार इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम अपने ‘स्व’ (स्वत्व) को भूल गए, जिससे समाज में कुरीतियां और विभाजन पैदा हुआ। इसका एकमात्र समाधान एक समरस, संगठित और अनुशासित हिंदू समाज का निर्माण करना है।
हिंदू शब्द की व्यापक परिभाषा और वैश्विक कल्याण
डॉ. भागवत ने ‘हिंदू’ शब्द को अत्यंत उदार और व्यापक बताया। उन्होंने कहा कि भारत में निवास करने वाला हर व्यक्ति हिंदू है, भले ही उसकी पूजा पद्धति, मत या पंथ अलग क्यों न हो। उन्होंने जोर देकर कहा, “हिंदू का अर्थ है—जोड़ना। हम केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण चराचर जगत और ब्रह्मांड के कल्याण की कामना करते हैं।” उन्होंने गर्व के साथ उल्लेख किया कि पिछले 200 वर्षों में भारत ने जितने महापुरुष पैदा किए, उतने दुनिया के किसी अन्य देश ने नहीं किए।

संघ का संघर्षमय सफर और वर्तमान अनुकूलता
संघ के 100 वर्षों के इतिहास को याद करते हुए डॉ. भागवत ने बताया कि यह यात्रा फूलों की सेज नहीं थी। संघ ने तीन बार प्रतिबंध झेले, स्वयंसेवकों पर झूठे आरोप लगे, राजनीतिक विरोध हुआ और कई स्वयंसेवकों को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन स्वयंसेवकों की अटूट इच्छाशक्ति के कारण आज संघ एक ऐसे कालखंड में है जहाँ परिस्थितियां उसके अनुकूल हैं और स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में राष्ट्र निर्माण का कार्य कर रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य नीति पर संघ का दृष्टिकोण
जिज्ञासा समाधान सत्र के दौरान जब उनसे कम शिक्षा बजट पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि बजट सरकार का विषय है, लेकिन शिक्षा का सुलभ होना समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने प्राचीन परंपरा का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले समाज के सहयोग से विद्यालय चलते थे, आज भी हमें उसी संस्कार की आवश्यकता है। ‘एक राष्ट्र-एक शिक्षा’ और ‘एक स्वास्थ्य नीति’ पर उन्होंने कहा कि नीतियां तो मौजूद हैं, लेकिन उन्हें लागू करना राज्यों का विषय है। संघ का प्रयास है कि ऐसे राष्ट्रीय विषयों पर समाज में एक राय और एकरूपता बने।

सामाजिक समरसता और राजनीति में जातिवाद
राजनीति में जाति के आधार पर टिकट वितरण के प्रश्न पर डॉ. भागवत ने कहा कि संघ सामाजिक समरसता के लिए गहराई से काम कर रहा है। समाज को बांटने वाली शक्तियों से सावधान रहना होगा। उन्होंने कहा, “जब समाज जातिवाद को स्वीकार करता है, तभी राजनीतिक दल उसका लाभ उठाते हैं। संघ में आने पर जाति का विस्मरण हो जाता है, और यही आचरण हमें पूरे समाज में फैलाना होगा।”
मूल्यों का क्षरण और आधुनिक चुनौतियां (OTT)
आदर्श मूल्यों में आ रही गिरावट पर उन्होंने कहा कि हमें ‘अर्जन’ (कमाई) के साथ ‘विसर्जन’ (दान) के वैदिक सिद्धांत को अपनाना होगा। अपनी जरूरत भर रखकर शेष समाज को लौटाना ही संस्कार है। वहीं, ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जा रही सामग्री पर उन्होंने कहा कि यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि हम क्या देखना चाहते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि उसी इंटरनेट पर रामायण और हनुमान चालीसा भी उपलब्ध है, चुनाव हमें करना है।
अंत में, सरसंघचालक ने समाज की ‘सज्जन शक्ति’ से आह्वान किया कि केवल संघ के भरोसे न रहें, बल्कि राष्ट्र उत्थान के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं प्रयत्नशील होना होगा।

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