
उत्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर ‘बाहरी’ बनाम ‘अंदरूनी’ का विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। हाल ही में कानपुर देहात में पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें दरकिनार कर दिया गया है, जबकि दूसरे दलों से आए नेताओं को सीधे मंत्री या संगठन में बड़े पद दिए जा रहे हैं। यह असंतोष न केवल पार्टी के लिए अंदरूनी चुनौती बन रहा है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के लिए एक बड़ी सिरदर्द बन सकता है।
सरकार में ‘बाहरी’ नेताओं का दबदबा
राज्य मंत्रिमंडल में कुल 54 मंत्री हैं, जिनमें से 15 मंत्री ऐसे हैं जो मूल रूप से भाजपा से नहीं हैं। ये नेता समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) या कांग्रेस जैसे अन्य दलों से भाजपा में शामिल हुए हैं। कानपुर देहात के पूर्व जिलाध्यक्ष मनोज शुक्ला और अन्य पुराने नेताओं ने आरोप लगाया है कि जिले के चारों विधायक भी दूसरे दलों से आए हैं। उनका कहना है कि जो कार्यकर्ता वर्षों से संगठन के लिए मेहनत कर रहे हैं, उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे उनमें भारी नाराजगी है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भाजपा के सहयोगी दल निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और सुभासपा अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं। इन तीनों दलों का गठबंधन और भाजपा के भीतर पनप रही यह अंदरूनी खींचतान, आगामी विधानसभा चुनावों में भगवा खेमे के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

पुराने कार्यकर्ताओं का असंतोष
भाजपा के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं का मानना है कि वर्षों की कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें सरकार या संगठन में कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिल रहा है। वे देख रहे हैं कि ‘बाहरी’ नेताओं को सीधे बड़े पदों से नवाजा जा रहा है, जबकि वे हाशिए पर हैं। इस तरह का असंतोष पार्टी के भीतर एक बड़ी दरार पैदा कर सकता है, जिसका असर जमीनी स्तर पर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है। यह बाहरी बनाम अंदरूनी का विवाद, अगर समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो 2027 के विधानसभा चुनावों में विपक्ष और सहयोगी दलों के अलावा, भाजपा को अपनों से भी जूझना पड़ सकता है।

पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी ने हालांकि इस विवाद को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा एक अनुशासित पार्टी है और जहां भी अनुशासनहीनता होती है, पार्टी कार्रवाई करती है। उन्होंने कानपुर देहात की घटना को स्वीकार करते हुए कहा कि वहां बातचीत की जा रही है और कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए हैं।
वहीं, पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तीकरण मंत्री नरेंद्र कश्यप ने इस मुद्दे पर अपना अलग विचार रखा। उन्होंने कहा कि जब कोई कार्यकर्ता या नेता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करता है तो वह पार्टी का हो जाता है और ‘बाहरी’ या ‘अंदरूनी’ की परिभाषा से दूर हो जाता है। उन्होंने कहा कि जब दोनों ने मिलकर काम किया तभी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी है। कश्यप ने कहा कि किसी भी दल के लिए इस तरह की चर्चा ठीक नहीं है।
यह विवाद दिखाता है कि भाजपा के लिए आंतरिक प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है, खासकर जब पार्टी नए और पुराने चेहरों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। आने वाले समय में, यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा नेतृत्व इस अंदरूनी चिंगारी को कैसे शांत करता है ताकि 2027 के चुनाव से पहले संगठन को एकजुट रखा जा सके।

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