
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही इस यात्रा का समापन अब एक बड़े सियासी बदलाव के साथ होगा। पहले पटना के गांधी मैदान में एक विशाल रैली की योजना थी, लेकिन अब महागठबंधन ने इसे बदलकर एक प्रतीकात्मक पदयात्रा करने का फैसला किया है। इस रणनीतिक बदलाव ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।
रैली से पदयात्रा का बदलाव: रणनीतिक या मजबूरी?
मोतिहारी में हुई एक प्रेस वार्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा ने इस बदलाव की घोषणा की। उन्होंने बताया कि 1 सितंबर को यात्रा के समापन पर पटना के गांधी मैदान में ‘वोटर अधिकार रैली’ की बजाय गांधी प्रतिमा से हाईकोर्ट के पास स्थित अंबेडकर प्रतिमा तक पदयात्रा होगी। इस बदलाव को राजनीतिक रूप से कई दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है।
एक तरफ, यह एक रणनीतिक निर्णय हो सकता है। एक विशाल रैली के लिए भारी भीड़ जुटाना एक जोखिम भरा काम होता है, खासकर जब विपक्षी गठबंधन सत्ता से बाहर हो। अगर भीड़ उम्मीद के मुताबिक नहीं जुटती तो यह विपक्ष के लिए नकारात्मक संदेश दे सकता है। इसके विपरीत, एक पदयात्रा कम लोगों के साथ भी प्रभावशाली और प्रतीकात्मक दिख सकती है। यह जनता के बीच सीधे पहुंचने और ‘सड़क पर आंदोलन’ का संदेश देने का एक प्रभावी तरीका है, जो राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की सफल रणनीति से प्रेरित लगता है।
गांधी से अंबेडकर: लोकतंत्र और संविधान का संदेश
पदयात्रा का मार्ग भी राजनीतिक रूप से गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। गांधी प्रतिमा से अंबेडकर प्रतिमा तक का रास्ता चुनना यह दर्शाता है कि महागठबंधन अपनी लड़ाई को सिर्फ ‘वोट चोरी’ तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से जोड़ना चाहता है। महात्मा गांधी अहिंसक आंदोलन और आजादी के प्रतीक हैं, जबकि डॉ. अंबेडकर संविधान और दलितों-वंचितों के अधिकारों के संरक्षक हैं। यह संदेश साफ है कि विपक्षी गठबंधन लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के लिए लड़ रहा है, जिसका वे दावा करते हैं कि भाजपा द्वारा उल्लंघन किया जा रहा है।

पवन खेड़ा ने भी अपनी प्रेस वार्ता में इसी भावना को व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह पदयात्रा एक ऐसी क्रांति की शुरुआत करेगी जो पूरे देश में फैलेगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि आज पूरा देश बिहार की ओर देख रहा है, क्योंकि इस क्रांति की शुरुआत बिहार से ही होनी है।
जनसमर्थन का दावा और सत्ता पर सीधा हमला
यात्रा के दौरान महागठबंधन के नेताओं ने लगातार जनसमर्थन मिलने का दावा किया है। राजद के सांसद संजय यादव ने कहा कि यह यात्रा 12 दिनों में 20 जिलों तक पहुंच चुकी है और इसे ‘अभूतपूर्व जनसमर्थन’ मिला है। उन्होंने इसे एक ‘तीर्थ यात्रा’ बताया, जिससे साफ है कि महागठबंधन इस आंदोलन को सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि एक जन आंदोलन के रूप में पेश करना चाहता है।
संजय यादव ने ‘वोट की चोरी’ के मुद्दे पर सत्ताधारी भाजपा पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा, “जब वोट ही छीन लिया जाएगा तो लोकतंत्र में बचेगा क्या?” उन्होंने बिहार को ‘गणतंत्र की जननी’ बताते हुए आरोप लगाया कि भाजपा यहां ‘गण’ को समाप्त करना चाहती है। इसके साथ ही उन्होंने बिहार को रोजगार और उद्योग-धंधे देने की जरूरत पर भी जोर दिया, जो दिखाता है कि महागठबंधन केवल राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि लोगों की आर्थिक जरूरतों को भी उठा रहा है।
कुल मिलाकर, पटना में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का समापन रैली की बजाय पदयात्रा से करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह महागठबंधन को एक सशक्त और निर्णायक संदेश देने का मौका देता है कि वे सड़कों पर उतरकर जनता के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब देखना यह है कि यह पदयात्रा बिहार की राजनीति में कितना बड़ा बदलाव ला पाती है और क्या यह आगामी चुनावों में महागठबंधन के लिए जीत का मार्ग प्रशस्त कर पाएगी।

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