
रमजान-उल-मुबारक का पवित्र महीना शुरू होते ही जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने देश के मुसलमानों के नाम एक महत्वपूर्ण संदेश जारी किया है। उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि वर्तमान दौर में मानवीय मूल्यों, ईमान और सिद्धांतों पर लगातार चौतरफा दबाव बढ़ रहे हैं। ऐसे में उन्होंने अपील की है कि इस साल मुसलमान रमजान को केवल एक पारंपरिक रस्म के रूप में न देखें, बल्कि इसे अपने आंतरिक सुधार और एक सिद्धांतवादी जीवन की ‘संजीदा परियोजना’ (सीरियस प्रोजेक्ट) के तौर पर अपनाएं।
ईमान और नैतिक शक्ति का संतुलन
मीडिया को जारी अपने आधिकारिक बयान में सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि रोजा रखने का असली मकसद नेकदिली, सब्र और नैतिक ताकत को बढ़ाना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईश्वर की भक्ति केवल बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि यह दिल की एक ऐसी स्थिति है जहाँ इंसान को हर पल अल्लाह की मौजूदगी और उसकी निगरानी का गहरा अहसास रहता है। यही अहसास इंसान के भीतर गुनाहों के प्रति हिचकिचाहट पैदा करता है और उसे अच्छाई की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता है।

रस्मों से आगे बढ़कर जागृति की ओर
हुसैनी ने रोजे के आध्यात्मिक (Spiritual) पहलू पर गहराई से रोशनी डालते हुए कहा कि यह पवित्र महीना आस्तिकों को बाहरी अनुशासन से परे एक आत्मिक जागृति के साथ जीना सिखाता है। उनके अनुसार, भूख और प्यास पर नियंत्रण हमें यह सिखाता है कि शरीर का आराम और शारीरिक खुशियाँ ही सार्थक जीवन की परिभाषा नहीं हैं। जब एक मोमिन (आस्तिक) अल्लाह की खातिर अपनी शारीरिक इच्छाओं को रोकता है, तो उसका परिचय ‘आध्यात्मिक सुख’ से होता है। पश्चाताप (तौबा) और क्षमा मांगने से न केवल रूह स्वच्छ होती है, बल्कि जीवन का उद्देश्य भी पुनः स्पष्ट हो जाता है।
संयम: पहाड़ की तरह अडिग रहने का नाम
रमजान को ‘संयम का महीना’ बताते हुए जमाअत प्रमुख ने कहा कि आज के चुनौतीपूर्ण समय में संयम का अर्थ है कि इंसान अपने उसूलों पर पहाड़ की तरह डटा रहे। चाहे बाहरी शक्तियां कितना भी दबाव डालें या आंतरिक इच्छाएं भटकाने की कोशिश करें, एक रोजेदार को विचलित नहीं होना चाहिए। रोजा हमें सिखाता है कि हम काम के बोझ और ध्यान भटकाने वाली चीजों के बीच खुद पर काबू रखें। यह अभ्यास सुनिश्चित करता है कि हमारे जीवन के फैसले भावनाओं के जोश में नहीं, बल्कि सिद्धांतों (Principles) के आधार पर हों।
डिजिटल युग और नैतिक चुनौतियां
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने आधुनिक समय की चुनौतियों, विशेषकर सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में ‘बेशर्मी’ का प्रसार और नैतिकता को मिल रही चुनौतियां चिंताजनक हैं। आस्था और मूल्यों पर इस समय बहुत ज्यादा दबाव है। उन्होंने मुसलमानों से पुरजोर आग्रह किया कि वे डिजिटल युग के भटकाव से बचकर रमजान को अपने जीवन का एक ऐसा ‘टर्निंग पॉइंट’ बनाएं, जिससे उनके व्यक्तिगत और सामूहिक चरित्र में पवित्रता और संकल्प का समावेश हो।
अंत में उन्होंने आह्वान किया कि अल्लाह की खातिर अपनी नींद, खाने की आदतों और दैनिक रूटीन में जो बदलाव हम रमजान में करते हैं, वही हमें कठिन निर्णय लेने और दबाव में भी सत्य पर डटे रहने की इच्छाशक्ति प्रदान करते हैं। रमजान को रस्मों की बेड़ियों से निकालकर इसे आत्म-मंथन का महीना बनाना ही समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

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