
लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हिंदू समाज की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित ‘सामाजिक सद्भाव बैठक’ को संबोधित करते हुए उन्होंने हिंदू समाज से संगठित, सशक्त और सजग रहने का आह्वान किया। भागवत ने स्पष्ट कहा कि हमें किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सावधानी बरतना समय की मांग है।
जनसंख्या असंतुलन और ‘तीन बच्चों’ का मंत्र
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में घटती हिंदू जनसंख्या के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। वैज्ञानिकों और जनसांख्यिकीय विशेषज्ञों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जिस समाज में प्रजनन दर प्रति परिवार औसतन तीन बच्चों से कम होती है, वह समाज धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देता है और अंततः समाप्त हो जाता है।
उन्होंने नवदंपतियों और हिंदू परिवारों को जागरूक करने की सलाह देते हुए कहा, “समाज को सशक्त बनाए रखने के लिए हर परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। विवाह की सही आयु 19 से 25 वर्ष के बीच है और विवाह का मुख्य उद्देश्य वासना पूर्ति नहीं, बल्कि सृष्टि को निरंतर आगे बढ़ाना और कर्तव्य बोध होना चाहिए।”
धर्मांतरण और घुसपैठ पर ‘ट्रिपल डी’ फॉर्मूला
सरसंघचालक ने कथित जबरन धर्मांतरण और बढ़ती घुसपैठ पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि प्रलोभन या दबाव में किए जा रहे मतांतरण पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ‘घर वापसी’ (स्वधर्म में वापसी) के कार्य को गति देने पर जोर दिया और अपील की कि जो लोग पुनः हिंदू धर्म में लौट रहे हैं, समाज को उनका पूरा ध्यान रखना चाहिए।
घुसपैठ के मुद्दे पर उन्होंने सरकार और समाज को सतर्क करते हुए ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ (पहचानें, हटाएं और बाहर करें) का मंत्र दिया। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि घुसपैठियों को किसी भी प्रकार का रोजगार नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के लिए बड़ा खतरा है।

सामाजिक सद्भाव और भेदभाव का अंत
समाज में व्याप्त जातिवाद और भेदभाव पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि हम सभी एक ही भारत माता की संतान हैं। उन्होंने कहा, “समय के चक्र के साथ भेदभाव की कुप्रथा हमारे आचरण में आ गई है, जिसे अब जड़ से मिटाना होगा। सनातन विचारधारा कभी भी विरोधियों को मिटाने की बात नहीं करती, बल्कि सत्य के अन्वेषण और समन्वय पर जोर देती है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि संघर्ष से नहीं, बल्कि समन्वय से ही दुनिया आगे बढ़ती है। जो लोग समाज में पिछड़ गए हैं, उन्हें झुककर ऊपर उठाना और अपनाना ही असली हिंदुत्व है।
मातृशक्ति का सम्मान और वैश्विक भूमिका
महिलाओं की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में मातृशक्ति केवल घर का आधार नहीं, बल्कि शक्ति का स्वरूप है। उन्होंने पश्चिम की भौतिकवादी सोच की तुलना में भारतीय दृष्टिकोण को श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि हमारे यहां नारी को पत्नी से अधिक ‘माता’ के रूप में सम्मान दिया जाता है। महिलाओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण मिलना चाहिए क्योंकि वह ‘असुर मर्दिनी’ का स्वरूप हैं।
विदेशी शक्तियों की साजिश से सावधान
सरसंघचालक ने आगाह किया कि अमेरिका और चीन जैसी वैश्विक शक्तियों में बैठे कुछ तत्व भारत की सद्भावना को बिगाड़ने के लिए सुनियोजित योजनाएं बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें आपसी अविश्वास को समाप्त कर एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होना होगा। भागवत ने विश्वास जताया कि भारत निकट भविष्य में विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करेगा और पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा।
इस महत्वपूर्ण बैठक में सिख, बौद्ध, जैन समाज के प्रतिनिधियों के साथ-साथ रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, गायत्री परिवार और संत रविदास पीठ सहित विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

गांव से लेकर देश की राजनीतिक खबरों को हम अलग तरीके से पेश करते हैं। इसमें छोटी बड़ी जानकारी के साथ साथ नेतागिरि के कई स्तर कवर करने की कोशिश की जा रही है। प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक की राजनीतिक खबरें पेश करने की एक अलग तरह की कोशिश है।



