
बिहार में चल रही महागठबंधन की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में शामिल होने पहुंचे कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने गुरुवार को चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने चुनाव में पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग गड़बड़ी के सारे तत्वों को छुपाने का काम कर रहा है।
दरभंगा में मीडिया से बातचीत के दौरान सचिन पायलट ने कहा कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रेस वार्ता के दौरान कर्नाटक और अन्य राज्यों में वोटर लिस्ट में हुई गड़बड़ी को तथ्यों के साथ उजागर किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर चुनाव आयोग वोटर लिस्ट और वहां की सीसीटीवी फुटेज क्यों नहीं देना चाहता? उन्होंने कहा कि सवाल पूछने पर आयोग शपथपत्र मांगा जाता है, जो उसकी कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करता है। पायलट ने जोर देकर कहा कि उनकी मांग है कि चुनाव पारदर्शी तरीके से हों और वोटर लिस्ट की दोबारा जांच की जाए।
चुनाव आयोग और भाजपा के बीच ‘गठबंधन’ का आरोप
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि जब चुनाव आयोग से सवाल किया जाता है, तो उसका जवाब भाजपा के प्रवक्ता देते हैं, जो यह दर्शाता है कि दोनों के बीच एक अनौपचारिक गठबंधन है। उन्होंने कहा कि बिहार में लाखों लोगों को वोट देने से वंचित किया जा रहा है और इसी के विरोध में महागठबंधन के नेता राहुल गांधी के साथ मिलकर ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाल रहे हैं। पायलट ने कहा कि इस यात्रा में ‘इंडिया’ गठबंधन के सभी नेता एक साथ आ रहे हैं और सच्चाई की लड़ाई लड़ रहे हैं।
अमेरिकी टैरिफ पर सरकार की विदेश नीति पर सवाल
सचिन पायलट ने अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के फैसले पर भी केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की कूटनीति कमजोर रही है, जिसकी वजह से इस तरह के टैरिफ लगाए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि यह टैरिफ एशिया के किसी और देश पर नहीं लगाया गया, जबकि चीन भारत से कहीं ज्यादा तेल रूस से खरीदता है, लेकिन उस पर भी ऐसा कोई शुल्क नहीं लगाया गया।
पायलट ने कहा कि इस फैसले का खामियाजा देश के कुटीर उद्योग को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह बड़े उद्योगपतियों को तो लाखों रुपये का राहत पैकेज दे सकती है, लेकिन छोटे उद्योग वाले के लिए क्यों नहीं? उन्होंने इस स्थिति को सरकार की बहुत बड़ी नाकामयाबी बताया।
सचिन पायलट का यह दौरा और उनका बयान यह दर्शाता है कि ‘इंडिया’ गठबंधन अब केवल चुनावी मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सरकार की विदेश नीति और आर्थिक फैसलों पर भी मुखर होकर हमला कर रहा है। उनकी टिप्पणी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और देश की विदेश नीति दोनों पर सवाल उठाती है, जो आगामी चुनावों में एक प्रमुख बहस का विषय बन सकता है।

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