
पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानूनी गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। ईडी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि आईपैक (I-PAC) के दफ्तर और अन्य ठिकानों पर छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ने जांच प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से दखलंदाजी की थी। एजेंसी ने सीएम ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
सॉलिसिटर जनरल का तीखा प्रहार
बुधवार को सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस अनुरोध का कड़ा विरोध किया, जिसमें जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा गया था। एसजी ने इसे मामले को लटकाने की सोची-समझी कोशिश करार दिया। उन्होंने अदालत में दलील दी कि जब किसी राज्य की मुख्यमंत्री केंद्रीय एजेंसी की जांच को रोकने के लिए खुद मौके पर पहुंच जाती हैं, तो यह एक गंभीर संवैधानिक संकट है। उन्होंने सवाल उठाया कि दो हफ्ते पहले ईडी का जवाब दाखिल होने के बावजूद सरकार को और समय क्यों चाहिए?
अनुच्छेद 32 और ईडी की वैधता पर सवाल
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने ईडी की याचिका की स्वीकार्यता पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने तर्क दिया कि ईडी कोई नागरिक नहीं है, बल्कि सरकार का एक हिस्सा है। दीवान के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 32 केवल नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों के हनन पर अदालत आने का अधिकार देता है। उन्होंने दलील दी कि क्या ईडी जैसी सरकारी एजेंसी इस अनुच्छेद के तहत रिट याचिका दायर कर सकती है? यह मुद्दा संविधान के मूल ढांचे और व्याख्या से जुड़ा है, इसलिए इसे पांच जजों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए।

ममता बनर्जी का आईपैक दफ्तर दौरा और टीएमसी का डेटा
मामले की जड़ 8 जनवरी की उस घटना में है, जब ईडी ने लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के आवास और बिधाननगर स्थित आईपैक दफ्तर पर छापेमारी की थी। हलफनामे के अनुसार, सीएम ममता बनर्जी को सूचना मिली थी कि तलाशी के दौरान तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बेहद संवेदनशील राजनीतिक और चुनावी डेटा को खंगाला जा रहा है। मुख्यमंत्री का तर्क था कि यह डेटा आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति से जुड़ा है और जांच एजेंसी इसका गलत इस्तेमाल कर सकती है। इसी सूचना के बाद उन्होंने मौके का दौरा किया था, जिसे ईडी ने “जांच में बाधा” माना है।
केरल और बंगाल की याचिकाओं का हवाला
एसजी तुषार मेहता ने बंगाल सरकार की दलीलों को काटते हुए कहा कि खुद पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिकाएं दायर की हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी तय किया है कि वह तकनीकी आधार पर सुनवाई टालने के बजाय मामले के गुण-दोष पर सुनवाई करेगा। मेहता ने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री और शीर्ष पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच अनिवार्य है क्योंकि यह कानून व्यवस्था और संघीय ढांचे के दुरुपयोग का मामला है।
अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
कोर्ट में हुई इस तीखी बहस के बाद अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। जहां एक तरफ ममता बनर्जी इसे राजनीतिक प्रतिशोध और डेटा की निजता का मामला बता रही हैं, वहीं ईडी इसे एक मुख्यमंत्री द्वारा संवैधानिक संस्था के कार्य में हस्तक्षेप मान रही है। अदालत को अब यह तय करना है कि क्या यह याचिका सुनवाई योग्य है और क्या मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

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