
ओडिशा भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल उरांव ने एक अप्रत्याशित घोषणा कर राजनीति गलियारों में हलचल मचा दी है। संबलपुर में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे भविष्य में कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ेंगे। इस घोषणा के बाद ओडिशा में भाजपा की रणनीति और आदिवासी राजनीति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
पार्टी के लिए करेंगे काम
कार्यक्रम के दौरान जुएल उरांव ने कहा, “मैंने फैसला कर लिया है कि अब कोई चुनाव नहीं लड़ूंगा। अब समय है कि पार्टी के लिए काम करूं और युवाओं को आगे लाऊं।” उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी, उसे वे पूरी निष्ठा से निभाएंगे। मीडिया से बातचीत में उन्होंने दोहराया कि अब उनका ध्यान संगठन को मजबूत करने और युवाओं को नेतृत्व में तैयार करने पर रहेगा।
लंबा राजनीतिक सफर और अनुभव
73 वर्षीय जुएल उरांव का राजनीतिक सफर बेहद लंबा और अनुभवों से भरा रहा है। वे ओडिशा में भाजपा के आदिवासी चेहरे के रूप में दशकों से सक्रिय हैं। 1998 से वे सुंदरगढ़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए आठ बार लोकसभा और दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में वे जनजातीय मामलों के पहले केंद्रीय मंत्री बने थे और तब से लेकर अब तक पार्टी में उनकी छवि एक जमीनी नेता की रही है, जिन्होंने आदिवासी समाज को भाजपा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।
युवाओं को मिलेगा नया अवसर
जुएल उरांव ने अपने बयान में युवाओं को लेकर विशेष संदेश दिया। उन्होंने कहा, “अब वक्त आ गया है कि नई पीढ़ी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाने का अवसर दिया जाए। जब तक पुराने नेता पीछे नहीं हटेंगे, तब तक युवाओं के लिए नेतृत्व के रास्ते नहीं खुलेंगे।” उनका यह बयान ओडिशा में भाजपा के कई युवा नेताओं के लिए अवसर के नए द्वार खोल सकता है।
राज्यसभा या राज्यपाल बनने की इच्छा जताई
भले ही उरांव ने प्रत्यक्ष चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी हो, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि अगर पार्टी चाहे तो वे राज्यसभा सदस्य या राज्यपाल बनने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी जो भी जिम्मेदारी तय करेगी, उसे वे पूरी ईमानदारी से निभाएंगे। इससे उनके राजनीतिक अनुभव का लाभ पार्टी को आने वाले समय में भी मिलता रहेगा।
ओडिशा भाजपा की रणनीति पर असर
जुएल उरांव के चुनावी राजनीति से संन्यास के ऐलान के बाद ओडिशा में भाजपा को अपना आदिवासी नेतृत्व पुनर्गठित करना होगा। सुंदरगढ़ और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में उरांव का व्यापक जनाधार रहा है। ऐसे में अब पार्टी को संगठन में आदिवासी वर्ग से नए चेहरों को आगे लाना होगा ताकि उनकी पकड़ कमजोर न पड़े।
केंद्रीय मंत्रिमंडल में बना रहेगा योगदान
उल्लेखनीय है कि एनडीए सरकार के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद जुएल उरांव को फिर से केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। जनजातीय मामलों के मंत्री के रूप में उन्होंने कई योजनाओं को गति देने का काम किया। संभावना है कि वे अब भी नीति निर्धारण और संगठन निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे।
जुएल उरांव का यह फैसला दर्शाता है कि वे राजनीति में युवा नेतृत्व को जगह देने के पक्षधर हैं। अब देखना होगा कि भाजपा ओडिशा में उनकी विरासत को किस तरह आगे बढ़ाती है और किस युवा नेता को आदिवासी समाज में उनकी जगह मजबूत करने का मौका मिलता है। इतना जरूर है कि उरांव का अनुभव पार्टी के लिए भविष्य में भी मार्गदर्शक बना रहेगा।

गांव से लेकर देश की राजनीतिक खबरों को हम अलग तरीके से पेश करते हैं। इसमें छोटी बड़ी जानकारी के साथ साथ नेतागिरि के कई स्तर कवर करने की कोशिश की जा रही है। प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक की राजनीतिक खबरें पेश करने की एक अलग तरह की कोशिश है।



