
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में जब भी सितार का जिक्र होता है, एक नाम सबसे ऊपर चमकता है—उस्ताद विलायत खां। आज 13 मार्च को उनकी पुण्यतिथि है। उन्हें ‘आफ़ताब-ए-सितार’ यानी ‘सितार का सूरज’ कहा जाता है। उस्ताद विलायत खां केवल एक वादक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे तपस्वी थे जिन्होंने अपने खून और पसीने से सितार की तारों में प्राण फूंके थे। उनके रियाज की कहानियां आज भी संगीत के गलियारों में अनुशासन और जुनून की मिसाल के तौर पर सुनाई जाती हैं।
रियाज का कठिन दौर: खून से रंग जाती थीं दीवारें
उस्ताद विलायत खां का मानना था कि संगीत कोई मनोरंजन नहीं, बल्कि एक कठोर साधना है। वे अक्सर बताते थे कि जवानी के दिनों में जब वे रियाज (अभ्यास) करते थे, तो उनकी उंगलियां सितार की तारों से घिसकर कट जाती थीं। तेजी से चलते हाथों और तारों के घर्षण से खून के छींटे सामने की टीन की दीवार पर पड़ते थे।
जब उनके दोस्त उन धब्बों को देखकर पूछते कि यह कैसा पैटर्न बना है, तो उस्ताद बस मुस्कुरा देते थे। उनका तर्क स्पष्ट था—”अगर दो-तीन हजार सरगम के बीच उंगली कट भी जाए, तो रुकने का मतलब है फिर से शून्य से शुरुआत करना।” इसी अदम्य साहस ने उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ सितार वादक बनाया।

‘गायकी अंग’: जब सितार गाने लगा
उस्ताद विलायत खां ने सितार वादन की एक विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे ‘गायकी अंग’ कहा जाता है। उन्होंने सितार के तारों पर मींड, गमक और बोल जैसे गायकी के तत्वों को इस तरह उतारा कि श्रोताओं को लगता था मानो सितार बज नहीं रहा, बल्कि कोई मधुर कंठ गा रहा है। उनके हाथों में सितार एक बेजान वाद्य यंत्र न रहकर भावनाओं को व्यक्त करने वाला माध्यम बन गया था।
पुश्तैनी विरासत और गौरवशाली इतिहास
1928 में गौरीपुर (वर्तमान बांग्लादेश) में जन्मे विलायत खां का नाता एक समृद्ध संगीत घराने से था। उनके पिता उस्ताद इनायत हुसैन खां और दादा उस्ताद इम्दाद खां अपने समय के दिग्गज सितार वादक थे। पिता के देहांत के बाद उन्होंने अपने नाना और मामा से संगीत की बारीकियां सीखीं। मात्र 8 वर्ष की उम्र में उनकी पहली रिकॉर्डिंग हुई, जिसने दुनिया को एक भविष्य के उस्ताद की आहट दे दी थी।
आजाद भारत के पहले सांस्कृतिक दूत
उस्ताद विलायत खां संभवतः भारत के पहले ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने आजादी के बाद इंग्लैंड जाकर भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम लहराया। उन्होंने लगभग पांच दशकों तक वैश्विक मंचों पर अपनी कला का जादू बिखेरा। उन्होंने सत्यजीत राय की फिल्म ‘जलसाघर’, ‘दी गुरु’ और ‘कादंबरी’ के लिए संगीत देकर सिनेमाई दुनिया को भी समृद्ध किया। उनके दोनों बेटे, सुजात हुसैन खां और हिदायत खां आज उनकी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

स्वाभिमान और सिद्धांतों के धनी
उस्ताद विलायत खां अपने स्वाभिमान के लिए भी जाने जाते थे। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उन्हें ‘आफ़ताब-ए-सितार’ के सम्मान से नवाजा था। हालांकि, उन्होंने 1964 में ‘पद्मश्री’ और 1968 में ‘पद्मविभूषण’ सम्मान लेने से इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने हमेशा कला को राजनीति और पुरस्कारों से ऊपर रखा।
अंतिम सफर और अमर विरासत
13 मार्च 2004 को फेफड़ों के कैंसर के कारण मुंबई के जसलोक अस्पताल में इस महान कलाकार ने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार कोलकाता में उनके पिता की कब्र के पास किया गया। भले ही आज वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सितार की झंकार और ‘गायकी अंग’ की मिठास हर उस संगीत प्रेमी के दिल में जिंदा है, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई को समझना चाहता है।

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