
भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 2024 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हुआ है, जिसने चुनावी बिसात की पूरी परिभाषा ही बदल दी। कभी चुनाव प्रचार तक सीमित रहने वाली ‘आधी आबादी’ अब भारतीय लोकतंत्र की ‘किंगमेकर’ बन चुकी है। आज राजनीतिक दलों के घोषणापत्र युवाओं या जातिगत समीकरणों के बजाय महिलाओं को केंद्र में रखकर तैयार हो रहे हैं। चुनाव आयोग और एसबीआई रिसर्च के ताजा आंकड़े गवाह हैं कि महिलाएं अब केवल मतदाता नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाली सबसे बड़ी ताकत हैं।
लोकसभा 2024: एक ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट
2024 के आम चुनाव मील का पत्थर साबित हुए, जब महिला मतदाताओं का टर्नआउट पहली बार पुरुष मतदाताओं को पीछे छोड़ गया। आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी 65.78 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों का आंकड़ा $65.55\%$ पर सिमट गया। इस चुनाव में लगभग 31.2 प्रतिशत करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो कि भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि महिलाएं अब घर की चारदीवारी से निकलकर देश की नीतियों में अपनी सीधी भागीदारी चाहती हैं।
विधानसभा चुनावों में महिलाओं का दबदबा
लोकसभा की यह लहर राज्यों के विधानसभा चुनावों में और भी उग्र होकर उभरी। झारखंड विधानसभा चुनाव (2024) में पहले ही चरण में 69.04 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया, जो पुरुषों 64.27 प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक था। वहीं, साल 2025 के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनावों ने सबको चौंका दिया। बिहार में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 प्रतिशत रहा, जबकि पुरुषों का 62.8 प्रतिशत प्रतिशत। यानी महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। यही ट्रेंड अब 9 अप्रैल 2026 को हो रहे असम, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में भी निरंतर देखा जा रहा है।
सीधे नकद हस्तांतरण और आर्थिक सशक्तिकरण
एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, महिला वोटिंग में इस भारी उछाल के पीछे ‘महिला-केंद्रित’ कल्याणकारी योजनाओं का सीधा हाथ है। महाराष्ट्र की ‘माझी लड़की बहिण योजना’ और झारखंड की ‘मंईयां सम्मान योजना’ जैसी स्कीमों ने महिलाओं के हाथ में सीधे पैसे पहुंचाए हैं। जब महिलाओं को बिना किसी बिचौलिए के सीधे आर्थिक मदद मिलती है, तो उनका तंत्र के प्रति विश्वास बढ़ता है। बिहार की ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ ने भी 10,000 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक की सहायता देकर महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है, जिसका बदला उन्होंने पोलिंग बूथ पर वोट देकर चुकाया।
बुनियादी सुविधाओं ने कम की जीवन की चुनौतियां
सशक्तीकरण केवल पैसों तक सीमित नहीं रहा। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत बने शौचालय, ‘हर घर जल’ योजना और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत घरों का मालिकाना हक मिलने से महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। घर में नल, बिजली और अपने नाम पर संपत्ति होने से महिलाओं के भीतर एक नया आत्मविश्वास जागा है। स्वयं सहायता समूहों (SHG) की मजबूती और मुद्रा योजना के तहत आसान लोन ने लगभग 36 लाख अतिरिक्त महिला मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ा है।
स्वतंत्र वोट बैंक के रूप में उदय और भविष्य की राह
आज की महिला मतदाता अब अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के प्रभाव में आकर वोट नहीं देती। वह एक स्वतंत्र वोट बैंक बन चुकी है, जो सुरक्षा, सम्मान और अपनी रसोई के बजट को ध्यान में रखकर फैसला लेती है। राजनीतिक दलों को यह साफ संदेश मिल चुका है कि अब चुनाव ‘जेंडर पॉलिटिक्स’ से ही जीते जा सकते हैं। यही कारण है कि महिला आरक्षण बिल के जरिए संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी अब राजनीति की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। भारतीय लोकतंत्र में अब नीतियां महिलाओं के इर्द-गिर्द ही बुनी जाएंगी, क्योंकि वे ही अब सबसे निर्णायक आवाज हैं।

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