
उत्तर प्रदेश में जातीय रैलियों, वाहनों पर जातिसूचक नाम लिखने और गाँवों-शहरों के प्रवेश द्वार पर जातिगत साइन बोर्ड लगाने पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर योगी सरकार ने 21 सितंबर को एक शासनादेश जारी कर इन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता के लिए एक आवश्यक कदम बताया है। हालांकि, विपक्ष इस फैसले को सत्ताधारी भाजपा की बौखलाहट और तानाशाही का प्रमाण बता रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) की सांसद इकरा हसन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “तानाशाही का नया फरमान” करार दिया है।
“भाजपा डरी हुई है और पीडीए की काट ढूंढ रही है”
कैराना से सांसद इकरा हसन ने शामली में मीडिया से बात करते हुए कहा कि भाजपा अपनी घटती लोकप्रियता और सत्ता खिसकते देख डर गई है। उन्होंने दावा किया कि सरकार यह कदम सपा के ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक अलायंस’ (पीडीए) की बढ़ती ताकत की काट ढूंढने के लिए उठा रही है। उन्होंने कहा, “यह फिर से एक नया फरमान है, जो तानाशाही का लगातार प्रदेश की जनता पर थोपा जा रहा है। यह स्पष्ट तौर पर दिखता है कि भाजपा बौखलाहट में है। वे कितने डर चुके हैं, क्योंकि कोई वर्ग या समाज उनसे आज खुश नहीं है।”
इकरा हसन ने आरोप लगाया कि यह शासनादेश देश की सांस्कृतिक विविधता और ‘अनेकता में एकता’ की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “हमारा देश विभिन्नता में एकता के लिए जाना जाता है। अगर ऐसे फरमान जारी किए जाएंगे, तो बहुत से लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी। हम इसका विरोध करते हैं।” उनका मानना है कि सरकार का काम विभिन्न समुदायों को एक साथ लाना है, न कि उन्हें दबाना या उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना। उन्होंने इस कदम को देश की संस्कृति और मर्यादा के खिलाफ बताया।
“जनता देगी जवाब, भाजपा को और मुँह की खानी पड़ेगी”
इकरा हसन ने सरकार पर जानबूझकर माहौल खराब करने का आरोप लगाया और कहा कि इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “यह सरकार की बौखलाहट है। लोग समझ चुके हैं कि ये डर गए हैं। उनकी राजनीति खत्म होती जा रही है। लोग उनकी काट वाली राजनीति से ऊपर उठने वाले हैं।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाजवादी पार्टी का पीडीए गठबंधन, जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक शामिल हैं, उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भी यह स्पष्ट रूप से दिखा। उन्होंने कहा कि हर वर्ग, हर पीड़ित वर्ग पीडीए से जुड़ रहा है, और भाजपा इस बढ़ती ताकत की कोई काट नहीं ढूंढ पा रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा को इस तरह के हथकंडों से कुछ हासिल नहीं होगा, क्योंकि जनता अब सब कुछ समझ चुकी है और उन्हें आगे और भी मुँह की खानी पड़ेगी।

कानूनी और राजनीतिक पहलुओं पर बहस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज में जातिवाद को बढ़ावा देने वाली इन प्रथाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। कोर्ट ने कहा था कि ये प्रथाएँ सामाजिक समानता के खिलाफ हैं और लोगों को जाति के आधार पर बाँटती हैं। कोर्ट के आदेश के बाद जारी किए गए शासनादेश में भी यही तर्क दिया गया है कि यह कदम समाज में सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगा।
हालांकि, विपक्षी दलों का तर्क है कि यह फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उनका कहना है कि भाजपा अपनी चुनावी रणनीति के लिए खुद को राष्ट्रवाद और सामाजिक सद्भाव के रक्षक के रूप में पेश करती है, लेकिन जब विपक्ष जातीय आधार पर संगठित होकर उसे चुनौती देता है, तो वह ऐसे प्रतिबंध लगाकर उसकी राजनीतिक ताकत को कमजोर करने का प्रयास करती है। सपा और अन्य विपक्षी दल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक पहचान पर हमला भी बता रहे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के इस फैसले का समाज और राजनीति पर क्या असर पड़ता है। क्या यह वास्तव में जातिगत विभाजन को कम करने में सफल होगा, या विपक्ष के आरोपों के अनुसार, यह सिर्फ एक राजनीतिक चाल साबित होगी, जिसका जनता चुनाव में जवाब देगी।

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